
हाय! रे पांचाली: E-book Access
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“हाय! रे पांचाली” अतीत के पौराणिक प्रसंगों और वर्तमान के अंतर्विरोधों के बीच संवाद स्थापित करता एक अत्यंत जीवंत, रचनात्मक और विचारोत्तेजक काव्य-गद्य संकलन है . इस कृति की सबसे बड़ी साहित्यिक विशिष्टता इसकी अनूठी संरचना में निहित है, जहाँ हर कविता के पीछे छुपा हुआ एक ‘गद्य-चिंतन’ पाठक को सीधे रचनाकार के दृष्टिकोण, उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि और सृजन-प्रक्रिया से जोड़ता है।
” जुए में हार गए तो क्या
अधिकार मेरा है सांसों पर।
शकुनी तो इतराएंगे ही
बेइमानी के पैसों पर।।
और बात नहीं टिक पाएगी ये
कलयुग के इतिहासों पर।
फिर खोदे जाएंगे मुर्दे
बहस छिड़ेगी की लाशों पर।। ”
यह संकलन व्यवस्था के मौन, सत्ता के चरित्र और न्याय की तलाश में भटकते आम आदमी के संघर्ष को पौराणिक संदर्भों के माध्यम से प्रखर स्वर देता है. यहाँ महाभारत के कुरुक्षेत्र की पृष्ठभूमि से लेकर आधुनिक जंतर-मंतर के अखाड़े और किसान आंदोलन तक का यथार्थ एक मजबूत सेतु का निर्माण करता है।
” बंद कर दो पिंजरे में
बाहर ना निकले
बिटिया होने लगी है
जवान धीरे-धीरे।
पढ़ेगी लिखेगी
तो हक मांगेगी
चलो सिल देते हैं इसकी
ज़बान धीरे-धीरे। ”
राजनीतिक विसंगतियों पर तीखे प्रहार के साथ-साथ इस पुस्तक में युवा मन की सहज अनुभूतियाँ, कॉलेज जीवन की स्मृतियाँ भी सलीके से कैद की गयीं हैं।
” हॉस्टल से निकल कर के आया हूं मैं
आई हो तुम भी अपने महल से निकल के।
तेरा रास्ता निहारे सहर हो गई
ताकते-ताकते दोपहर हो गई ।।
एक अरसा हुआ हम पर बरसी नहीं
दिल की नदियां सिकुड़ कर नहर हो गई।।
सदियों से जमा था पानी हो गया पिघल के
आई हो तुम भी अपने महल से निकल के।। ”
ये काव्य संकलन धुनिकता की अंधी दौड़ में पीछे छूटती जा रही मानवीय संवेदनाओं का भी एक सुंदर, दार्शनिक सामंजस्य है। सरल, प्रवाहपूर्ण और गंभीर भाषा शिल्प में ढली ये रचनाएँ पाठक को केवल भावों तक सीमित नहीं रखतीं, बल्कि उसकी सामूहिक चेतना को झकझोर कर इतिहास के गहरे मौन के विरुद्ध विद्रोह की एक नई आवाज़ बनती हैं।
” ना ओर पता ना छोर पता
क्या चीर शरीर से आई है।
बेसुध होकर गिरा दुशासन
केशव ने ली अंगड़ाई है।।
भूल ना जाओ कहीं पलटने
पन्ने अपने इतिहासों के।
इसी व्यथा से है मानस
मैंने या कलम उठाई है।। “

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