HAY! RE PANCHALI

HAY! RE PANCHALI
Publisher SapiensForum
Released March 8, 2026
Length 135 pages
Digital edition

HAY! RE PANCHALI

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क्या कभी किसी कविता ने आपको सिर्फ भावुक नहीं, बल्कि बेचैन भी किया है?
“हाय! रे पांचाली” ऐसी ही कविताओं और गद्य-चिंतन का संग्रह है, जो पाठक को प्रेम, समाज, सत्ता और आत्मा के गहरे सवालों से रूबरू कराता है।

इस पुस्तक में कविताएँ केवल पढ़ने के लिए नहीं हैं, बल्कि महसूस करने और सोचने के लिए हैं। महाभारत की पांचाली से लेकर आज की व्यवस्था तक, गाँव की मिट्टी से लेकर शहर की बेरुखी तक, प्रेम की कोमलता से लेकर राजनीति की कठोरता तक—यह संकलन पाठक को कई भावनात्मक और वैचारिक यात्राओं से गुजराता है।

पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि हर कविता के साथ एक गद्य-चिंतन भी प्रस्तुत है। इससे पाठक केवल कविता का रस ही नहीं लेता, बल्कि उसके पीछे छिपे विचार, पीड़ा, प्रश्न और रचनाकार की दृष्टि को भी समझ पाता है।

इस पुस्तक में आप पढ़ेंगे—
समाज के मौन पर प्रश्न उठाती “हाय! रे पांचाली”,
आत्मा के अदृश्य घावों को छूती “रूह”,
बदलते रिश्तों और टूटते मूल्यों की कहानी कहती “धीरे-धीरे”,
जीवन और मृत्यु के रहस्य को टटोलती “माया”,
एक शहीद के अधूरे सपनों को आवाज देती “शहीद का ख़त”,
गाँव की संवेदना और मिट्टी की महक से भरी “गाँव के लोग”,
और सत्ता, न्याय, प्रेम, स्मृति व मनुष्यता पर आधारित कई अन्य रचनाएँ।

“हाय! रे पांचाली” उन पाठकों के लिए है जो कविता में केवल तुकबंदी नहीं, बल्कि विचार, संवेदना और सच्चाई खोजते हैं। यह किताब उन लोगों को पसंद आएगी जिन्हें हिंदी कविता, सामाजिक चिंतन, नारी-विमर्श, राजनीतिक व्यंग्य, प्रेम और जीवन-दर्शन से जुड़ी रचनाएँ पढ़ना पसंद है।

यह संग्रह आपको कभी भीतर से छूएगा, कभी बेचैन करेगा, कभी आपकी स्मृतियों को जगाएगा और कभी आपको यह सोचने पर मजबूर करेगा कि हम जिस समाज में जी रहे हैं, उसमें अन्याय, प्रेम, मौन और मनुष्यता की असली जगह कहाँ है।

अगर आप ऐसी हिंदी किताब पढ़ना चाहते हैं जो दिल को भी छुए और दिमाग को भी झकझोरे, तो “हाय! रे पांचाली” आपके लिए है।

"हाय! रे पांचाली" अतीत के पौराणिक प्रसंगों और वर्तमान के अंतर्विरोधों के बीच संवाद स्थापित करता एक अत्यंत जीवंत, रचनात्मक और विचारोत्तेजक काव्य-गद्य संकलन है . इस कृति की सबसे बड़ी साहित्यिक विशिष्टता इसकी अनूठी संरचना में निहित है, जहाँ हर कविता के पीछे छुपा हुआ एक 'गद्य-चिंतन' पाठक को सीधे रचनाकार के दृष्टिकोण, उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि और सृजन-प्रक्रिया से जोड़ता है।

" जुए में हार गए तो क्या
अधिकार मेरा है सांसों पर।
शकुनी तो इतराएंगे ही
बेइमानी के पैसों पर।।
और बात नहीं टिक पाएगी ये
कलयुग के इतिहासों पर।
फिर खोदे जाएंगे मुर्दे
बहस छिड़ेगी की लाशों पर।। "

यह संकलन व्यवस्था के मौन, सत्ता के चरित्र और न्याय की तलाश में भटकते आम आदमी के संघर्ष को पौराणिक संदर्भों के माध्यम से प्रखर स्वर देता है. यहाँ महाभारत के कुरुक्षेत्र की पृष्ठभूमि से लेकर आधुनिक जंतर-मंतर के अखाड़े और किसान आंदोलन तक का यथार्थ एक मजबूत सेतु का निर्माण करता है।

" बंद कर दो पिंजरे में
बाहर ना निकले
बिटिया होने लगी है
जवान धीरे-धीरे।
पढ़ेगी लिखेगी
तो हक मांगेगी
चलो सिल देते हैं इसकी
ज़बान धीरे-धीरे। "

राजनीतिक विसंगतियों पर तीखे प्रहार के साथ-साथ इस पुस्तक में युवा मन की सहज अनुभूतियाँ, कॉलेज जीवन की स्मृतियाँ भी सलीके से कैद की गयीं हैं।

" हॉस्टल से निकल कर के आया हूं मैं
आई हो तुम भी अपने महल से निकल के।

तेरा रास्ता निहारे सहर हो गई
ताकते-ताकते दोपहर हो गई ।।
एक अरसा हुआ हम पर बरसी नहीं
दिल की नदियां सिकुड़ कर नहर हो गई।।
सदियों से जमा था पानी हो गया पिघल के
आई हो तुम भी अपने महल से निकल के।। "

ये काव्य संकलन धुनिकता की अंधी दौड़ में पीछे छूटती जा रही मानवीय संवेदनाओं का भी एक सुंदर, दार्शनिक सामंजस्य है। सरल, प्रवाहपूर्ण और गंभीर भाषा शिल्प में ढली ये रचनाएँ पाठक को केवल भावों तक सीमित नहीं रखतीं, बल्कि उसकी सामूहिक चेतना को झकझोर कर इतिहास के गहरे मौन के विरुद्ध विद्रोह की एक नई आवाज़ बनती हैं।

" ना ओर पता ना छोर पता
क्या चीर शरीर से आई है।
बेसुध होकर गिरा दुशासन
केशव ने ली अंगड़ाई है।।
भूल ना जाओ कहीं पलटने
पन्ने अपने इतिहासों के।
इसी व्यथा से है मानस
मैंने या कलम उठाई है।। "

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